(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.58. अध्यायः 058
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरम्प्रति स्त्रीणामतिक्रमे प्रायश्चित्तादिप्रतिपादकनारदमार्कण्डेयसंवादानुवादः॥ 1 ॥


Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

मार्कण्डेय उवाच।

श्रुतं नराणां चापल्यं परस्त्रीषु प्रजायताम्।
प्रमदानां तु चापल्ये दोषमिच्छामि वेदितुम्॥ 13-58-1(83745)
नारद उवाच। 13-58-2x(6935)
एकवर्णे विदोषं तु गमनं पूर्वकालिकम्।
धाता च समनुज्ञातो विष्णुना तत्तथाऽकरोत्॥ 13-58-2(83746)
भगलिङ्गे महाप्राज्ञ पूर्वमेव प्रजापतिः।
ससर्ज ताभ्यां संयोगमनुज्ञातश्चकार सः॥ 13-58-3(83747)
अथ विष्णुप्रसादेन भगो दत्तवरः किल।
तेन चैव प्रसादेन सर्वांल्लोकानुपाश्नुते॥ 13-58-4(83748)
तस्मात्तु पुरुषे दोषो ह्यधिको नात्र संशयः।
विना गर्भं सवर्णेषु न त्याज्या गमनात्स्त्रियः॥ 13-58-5(83749)
प्रायश्चित्तं यथान्यायं दण्डं कुर्यात्स पण्डितः।
श्वभिर्वा दंशनं स्नानं सवनत्रितयं निशि॥ 13-58-6(83750)
भूमौ च भस्मशयनं दानं भोगविवर्जितम्।
दोषगौरवतः कालो द्रव्यगौरवमेव च।
मर्यादा स्थापिता पूर्वमिति तीर्थान्तरं गते॥ 13-58-7(83751)
तद्योषितीं तु दीर्घायो नास्ति दोषो व्यतिक्रमे।
भगतीर्थान्तरे शुद्धो विष्णोस्तु वचनादिह॥ 13-58-8(83752)
रक्ष्याश्चैवान्यसंवादैरन्यगेहाद्विचक्षणैः।
आसां शुद्धौ विशेषेण कर्मणां फलमश्नुते॥ 13-58-9(83753)
नैता वाच्या न वै वध्या न क्लेश्याः शुभमिच्छता।
विष्णुप्रसादादित्येव भगस्तीर्थान्तरं गतः।
मासिमासि ऋतुस्तासां दुष्कृतान्यपकर्षति॥ 13-58-10(83754)
स्त्रियस्तोषकरा नॄणां स्त्रियः पुष्टिप्रदाः सदा।
पुत्रसेतुप्रतिष्ठाश्च स्त्रियो लोके महाद्युते॥ ॥ 13-58-11(83755)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टपञ्चाशोऽध्यायः॥ 58 ॥


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